काशी विश्वनाथ के मूल मंदिर स्थान के लीये मुकदमा मंजूर

विश्व हिन्दू रक्षा वहीनी के द्वारा दायर मुकदमा सफलता की तरफ बढ़ रहा है , कोर्ट में दायर मुकदमें को मंजूरी देते हुए आगे की सुनवाई की तारीख का अस्वासन दिया है |


वाराणसी, जेएनएन। काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद मामले को लेकर दाखिल दावे को सिविल जज (सीनियर डिविजन) एमके सिंह की अदालत ने सुनवाई के लिए मंजूर कर लिया। अदालत ने गुरुवार को इस दावे को मूल वाद के रुप में दर्ज करने का आदेश देते हुए कहा कि काशी विश्वनाथ के मूल मंदिर स्थान, मां श्रंगार गौरी, मां गंगा, भगवान हनुमान, भगवान गणेश व नंदी की पूजा-अर्चना के अधिकार से संबंधित है जो कि सिविल अधिकार के अंतर्गत आता है। अत: सिविल वाद द्वारा ही इसका निस्तारण किया जाना न्यायोचित होगा।

उल्लेखनीय है कि ज्ञानवापी मामले में वर्ष 1991 में दाखिल एक अन्य मुकदमे सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट) आशुतोष तिवारी की अदालत में चल रहा है जिसमें परिसर के पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने की मांग को लेकर सुनवाई विचाराधीन है। यही नहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी एक मामला विचाराधीन है।

बता दें कि विश्वनाथ मंदिर में स्थित श्रंगार गौरी, गणेश आदि देवताओं की पूजा अर्चना को लेकर हरिशंकर जैन एडवोकेट, रंजना अग्निहोत्री एडवोकेट सहित अन्य ने 18 फरवरी 2021 को यह दावा दाखिल किया था। उस दिन प्रभारी सिविल जज (सीनियर डिवीजन) ने इसे प्रकीर्णवाद के रुप में दर्ज करते हुए याचिका की पोषणीयता पर सुनवाई के लिए उसे पीठासीन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दिया था।


नौ मार्च 2021 को सुनवाई के दौरान हरिशंकर जैन एडवोकेट ने दलील दी कि श्रद्धालुओं को प्लाट सेटेलमेंट संख्या 9130 पर स्थित मां शंृगार गौरी, भगवान विश्वेश्वर व अन्य देवताओं के मूल स्थान पर मंदिर निर्माण और दर्शन-पूजन का अधिकार मिले। काशी विश्वनाथ मंदिर के चारों ओर पांच कोस के दायरे में काशी अवमुक्तेश्वर क्षेत्र है जहां देवी शंृगार गौरी स्वयंभू हैं। धार्मिक ग्रंथों में आदि विश्वेश्वर मंदिर क्षेत्र में देवी शंृगार गौरी तथा अन्य देवों की पूजा निरंतर होने के प्रमाण मिलते हैं। मुगल शासक औरंगजेब ने वर्ष 1669 में ज्योॢतलिंग और शंृगार गौरी के भव्य मंदिर के एक बड़े हिस्से को ध्वस्त करा दिया था। अन्य देवता उसी प्राचीन मंदिर में विराजते रहे जिसे मुसलमान ज्ञानवापी मस्जिद का हिस्सा बताते हैं। हिंदू मंदिर के अवशेष आज भी ज्ञानवापी मस्जिद की दीवार पर देखे जा सकते हैं। प्राचीन पौराणिक देवता के पूरे भूभाग के एक हिस्से पर जबरन किए गए निर्माण को मस्जिद नहीं कहा जा सकता। क्योंकि ये निर्माण अधिकार से नहीं, बल्कि अतिक्रमण से किया गया है। देवता का धाॢमक स्थल वक्फ की संपत्ति नहीं हो सकती है। संविधान के विभिन्न प्राविधानों का हवाला देकर अदालत से मांग की कि पूरे ज्ञानवापी परिक्षेत्र को मंदिर घोषित किया जाए।

आजतक ने भी इस मुद्दे का संज्ञान लिया



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