संस्कृत: सनातन धर्म माहात्म्य : धर्म विवेचना

Updated: Oct 7, 2020


संस्कृत: सनातन धर्म माहात्म्य : धर्म विवेचना

“असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय”

जन सामान्य में हमारे प्राचीन ऋषियों-मुनियों के बारे में ऐसी धारणा जड़ जमाकर बैठी हुई है कि वे जंगलों में रहते थे, जटाजूटधारी थे, भगवा वस्त्र पहनते थे, झोपड़ियों में रहते हुए दिन-रात ब्रह्म-चिन्तन में निमग्न रहते थे, सांसारिकता से उन्हें कुछ भी लेना-देना नहीं रहता था।

इसी पंगु अवधारणा का एक बहुत बड़ा अनर्थकारी पहलू यह है कि हम अपने महान पूर्वजों के जीवन के उस पक्ष को एकदम भुला बैठे, जो उनके महान् वैज्ञानिक होने को न केवल उजागर करता है वरन् सप्रमाण पुष्ट भी करता है।

किसी भी शुभ कार्य से पहले हम अपने पूर्वजों को स्मरण करते हैं, हम अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए सबसे पहले ये जाने की हमारे पूर्वजों ने क्या कहा है :


धर्म हमारे भारतीय संस्कृति और दर्शन की प्रमुख संकल्पना है, ‘धर्म’ धब्द का पश्चिमी भाषाओं में कोई तुल्य शब्द पाना बहुत कठिन है।


साधारण शब्दों में धर्म के बहुत से अर्थ हैं जिनमें से कुछ ये हैं- कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचरण, सद्गुण आदि।

धर्म का मूल समझना है , अपनी सनातन संस्कृति के प्रति गर्व महसूस करना है तो हमे धर्म को परिभाषित करने वाले साधारण शब्दों और साधारण सतही समझ का त्याग करना होगा !

हमारी प्राचीन काल से चली आयी ‘धर्म’ की अवधारणा को सभी को ध्यान में लेना चाहिये, उपासना यह धर्म का केवल एक अंग है, सम्पूर्ण धर्म नहीं।

“धार्यते इति धर्म:”

‘धर्म’ की व्युत्पत्ति संस्कृत के “धृ” धातु से धर्म शब्द बना है जिसका अर्थ धारण करना होता है, जो सबको धारण करे, जो सबका आधार हो वह धर्म है।

महाभारत में लिखा है :

“धारणाद धर्ममित्याहु:,धर्मो धार्यते प्रजा:”

धर्म वह है जो प्रजा का धारण यानी रक्षण, पोषण करता है,


वह धारण करता है इस लिये उसे धर्म कहते हैं।

महा मुनि कणाद ने कहा हैैं :



“यतोअभयुद्य निश्रेयस सिद्धि: स धर्म:”

अर्थात जिससे अभ्युदय (लोकोन्नति) और निश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि होती हैं, वह धर्म हैं।

महर्षि मनु ने कहा हैैं :

श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम्।


आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत् ॥

धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो !


अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये।

अपने भारत वर्ष के इतिहास में शक, हूण, कुशान, यवन (यानी ग्रीक) आक्रामक करने आये, उन्होंने यहाँ विजय पाकर यहीं रहना पसन्द किया, काल के ओघ में वे सारे भारतीय सनातन संस्कृति से पोषित धर्म मुल्ल्यों पे आधारित समाज में विलीन हो गये।

गुजरात के गिरनार पर्वत पर रुद्रदामन् राजा का जो शिलालेख मिला है, उस में रुद्रदामनने अपनी पूर्वपीठिका बतायी है, उनके पिता का नाम जयदामन् था और पितामह का नाम चेष्टन था।


चेष्टन के पुत्रपौत्रों ने हिन्दू नाम स्वीकृत किये, इसी तरह से शक, हूण और कुशान भी विशाल हिन्दू धर्म में और समाज में विलीन हो गये।

आखिर ये सब कैसे हुआ, क्या हैं यहाँ हमारी मातृभूमि की मिटटी में की वो हर किसी को धारण कर लेती है, जो आता है वो उसी का हो जाता,


आखिर क्या धारण किया है यहाँ की प्रकृति ने ???

किस की धारणा करता है “सनातन धर्म” ?

सम्पूर्ण विश्‍व की, ब्रह्माण्ड की भी कह सकते हैं।

विश्‍व में चार प्रमुख अस्तित्व हैं :

एक है मानवव्यक्ति.


दूसरा है मानवसमष्टि…

मानवव्यक्ति समष्टि का अंश है, किन्तु समष्टि उसके बाहर भी है, किन्तु विश्‍व मानवसमष्टि के साथ समाप्त नहीं होता, क्यौं कि यहाँ पशु-पक्षी हैं, पहाड-नदीयाँ हैं, वृक्ष और वन भी हैं।

यानी चराचर सृष्टि है और मानवसमष्टि इस सृष्टि का अंश है।

और चौथा और सबसे महत्त्व का अस्तित्व है “चैतन्य”, जिसको मैं परमेष्ठी कहता हूँ, यह सब में है और सब के बाहर भी है।

व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्ठी इन चारों को जोडनेवाला जो सूत्र है इसका नाम ‘धर्म’ हैं।


जो विधा, अपने को व्यापकता से जोडती है वह ‘धर्म’ बन जाती है।

अपनी भाषा के कुछ शब्द लीजिये, जैसे धर्मशाला, धर्मार्थ अस्पताल, धर्मकांटा, राजधर्म, पुत्रधर्म आदि।

‘धर्मशाला’ में कौनसी उपासना होती है?


फिर ‘धर्मशाला’ क्यौं?

कारण हम अपने लिये कितना भी बडा और सुंदर मकान बनाइये वह ‘धर्म’ नहीं, जब औरों के निवास की व्यवस्था करते हैं, तब ‘धर्मशाला’ खडी होती है।

हम अपने लिये दवाईयों का कितना भी प्रबन्ध करें, वह ‘धर्म’ नहीं है, जब अन्यों के स्वास्थ्य की चिन्ता और व्यवस्था होती है, तब ‘धर्मार्थ अस्पताल’ बनता है, यह स्वयं को व्यापकता से जोडना है।

“राजधर्म” क्या राजा की उपासना है जो प्रजा की नहीं ??

जिन कर्तव्यों से राजा अपने को प्रजा से जोडता है वह राजधर्म है ।

और पुत्र जिन कर्तव्यों से स्वयं को माता-पिता से जोडता है वह पुत्रधर्म होता है, यही समष्टि धर्म है ।

सृष्टि के साथ भी जोडने की व्यवस्था है, आवश्यकता है सम्मान से और आदर से जोडना चाहिये, अत: सृष्टि को हम मातृस्वरूप में देखते है।

नदी लोकमाता बनती है, गंगामैय्या होती है, भूमि, भूमाता या मातृभूमि बतनी है, गौ ; गोमाता बनती है, अचल हिमालय देवतात्मा कहलाया जाता है।

पशुओं को पवित्रता अर्पण करने हेतु, उनको किसी ना किसी देवतास्वरूप से जोड दिया गया है, बैल को शंकरजी के साथ, गौ को भगवान् कृष्ण के साथ, हंस को सरस्वती के साथ, साँप को भी शंकर जी के साथ, छोटे चूहे को भी गणेशजी के साथ,

इसी प्रकार वनस्पतियों को भी, तुलसी भगवान् विष्णु के लिये, बिल्व शंकर जी के लिये, दूर्वा गणेश जी के लिये, औंदुबर दत्तात्रेय के लिये और वटवृक्ष सावित्री के साथ।

अन्तिम सीढी जो है वह परमेष्ठी के साथ जोडने की, यह उपासना का दायरा है..

“एकं सत्विप्रा बहुधा वदन्ति”

इस श्लोक का क्या अर्थ है, वह है परमात्मा या परमेष्ठी, वही सत् यानी अक्षय है, किन्तु उस की उपासना की अनेक विधायें हो सकती हैं..मतलब है बुद्धिमान लोग अनेक विधाओं से उस परमब्रह्म परमेश्वर का वर्णन कर सकते हैं।

यानी नाम अनेक हो सकते हैं, और अलग अलग नाम होने के लिये रूप भी अनेक होना आवश्यक है परमेश्वर का, इस लिये हम अपने उपासना के लिये किसी रूप का या नाम का स्वीकार कर सकते हैं, कुछ थोडे ऐसे भी हो सकते हैं कि जो निराकार, निर्गुण की भी उपासना कर सकते हैं।

उपासना को ही परमार्थसाधना कहते हैं, यही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है…और मोक्ष ही तो लक्ष्य है.

“यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि: स धर्म:”

यानी जिस से ‘अभ्युदय’ यानी ऐहिक उन्नति और‘नि:श्रेयस’ यानी पारमार्थिक कल्याण की सिद्धि होती है, वह ‘धर्म’ है, विश्‍व जैसा पारमार्थिक है वैसाही वह भौतिक भी है, ‘धर्म’ दोनों की चिन्ता करता है और व्यवस्था निहित करता है.

सनातन हिन्दू धर्म इस अर्थ में एकमात्र‘धर्म’ है, बाकी सब मजहब, सम्प्रदाय, पंथ एवं आस्थाएँ हैं !!

हिन्दू धर्म की इस विशाल व्यापकता के कारण ही वेदों की निन्दा करनेवाले गौतम बुद्ध को भी भगवान् का अवतार माना गया है।

कवि जयदेव का यह वचन –

निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम्


सदयहृदय दर्शितपशुघातम्


केशव धृतबुद्धशरीर । जय जगदीश हरे।

सनातन धर्म इतना व्यापक है की उसकी जितनी व्याख्या की जाए काम है, मेरी शिव समर्पित हृदय ने जितना साथ दिया उतना मैंने आपके सामने रख दिया, अत: यही विश्राम लेना चाहता हूँ।

“धर्मो रक्षति रक्षितः”

अर्थात तुम धर्म की रक्षा करो, धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा, स्मरण रहे , इस राष्ट्र और यहाँ की सनातन संस्कृति को रक्षा सुरक्षा की जिम्मेदारी अब हमारे कन्धों पे है, इसलिए हर कोई अब सजग हो जाए.

तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु…!!!

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