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🚩विश्व हिन्दू रक्षा वाहिनी के नियमावली,कानून व्यवस्था🚩 

परिचय -  विश्व हिन्दू रक्षा वाहिनी  संगठन किसी भी जाति अथवा संप्रदाय में आपसी विवाद उत्पन्न नहीं करती ,अपितु हमें यह विश्वास है कि समस्त हिन्दू किसी भी  जाति के हों सभी अपने मित्र तथा सहयोगी है तथा आर्य पुत्र है।
       विश्व हिन्दू रक्षा वाहिनी अपने दायित्वों को ध्यान में रखते हुए सिर्फ भारत वर्ष में ही नहीं अपितु समस्त विश्व में जितने भी सनातनी, भाई, बहन, माता- पिता, साथी- सारथी आदि सब हमारे सहयोगी है तथा सबमे एकता की भावना जागृत कर सभी को साथ में लेकर चलना, उनका सहयोग करना तथा धर्म के शिक्षण-रक्षण हेतु जागरूक करना हमारा कर्तव्य है।
  
गठन का उद्देश्य--
         विश्व हिन्दू रक्षा वाहिनी संगठन का गठन का मुख्य कारण समाज मे अनेको जातिवाद पर बने हिन्दूवादी संगठनों को आपस मे संगठित कर जातिवाद की भावना को खत्म करना तथा सभी को एकत्रित कर मानव धर्म अनुसार आचरण कर हिंदुत्व तथा सनातन धर्म को मजबूती प्रदान करना है।
 
 उद्देश्य:- 
1. विशाल हिंदू समाज में सामाजिक समरसता विकसित करने के लिए भेदभाव पूर्ण कुरीतियों का उन्मूलन करना एवं हिंदू समाज की एकता एवं पारस्परिक सद्भाव के लिए छुआछूत और ऊंच-नीच की भेद भाव पूर्ण सामाजिक विसंगतियों के उन्मूलन का निरंतर प्रयत्न करते हुए सद्भावना स्थापित करना। 

2.  विशाल हिंदू समाज में नासमझी भय और प्रलोभन के द्वारा या तथाकथित लोगों के दुर्व्यवहार के कारण जो लोग हिंदू समाज को छोड़ गए हैं या छोड़ने के लिए विवश किए गए हैं उन सभी भूले बिसरे हिंदू बंधुओं को अपने पारंपरिक धर्म में और समाज में वापस लाने का तथा उन्हें सम्मानजनक स्थान दिलाने का प्रयत्न करते रहना।

3. हिंदुस्तान की विशाल सांस्कृतिक विरासत को देश काल परिस्थिति के अनुरूप स्थापित करना तथा हिंदुओं को संगठित करते हुए सुरक्षित एवं संवर्धित करने हेतु प्रोत्साहित करना।

 

4. गौ पालन और उनका संरक्षण चाहे जिस उम्र के गोवंश हो उनकी हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगे इसके लिए विधाइ प्रयत्न एवं जन जागरण करते रहना।

 

5.  प्रत्येक हिंदू में हिंदुत्व की भावना जगाना तथा दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना को जागृत करते रहने की दिशा में कार्य करना।

6.  उन सभी मित्रों बंधुओं को राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा में सम्मिलित करने की दिशा में विधि सम्मत सभी तरह के प्रयत्न करते रहना जो दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में, नगर मै ,गांव में ,संपर्क के अभाव में अलग-थलग पड़े हुए हैं उन  सभी बंधुओं में राष्ट्रीय भावना जागृत करना।

7.  हिंदू समाज में प्रचलित विभिन्न धार्मिक संप्रदायों में सौहार्द सहयोग और आपसी समझ को विकसित करना।

8.  स्वास्थ्य गरीबी या अन्य किसी कारण से असहाय एवं पीड़ित माताओं बहनों बड़े बुजुर्गों तथा उत्पीड़ित शोषित व्यक्तियों को आवश्यकता के अनुरूप सेवा और सहयोग प्रदान करने की दिशा में कार्य करते रहना।

9. सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर यथासंभव अवसर या सहायता उपलब्ध कराना ताकि जो शिक्षित एवं बेरोजगारी के शिकार हैं वे स्वावलंबी बन सके इस दिशा में निरंतर प्रयत्न करते रहना।

10. उन तमाम राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से जो सामान विचारधाराओं के हैं उनसे आपसी समन्वय एवं संबद्धता स्थापित करना।

11. सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में तथा सामाजिक उपेक्षा के शिकार हिंदू जनों में हिंदुत्व के प्रति तथा देश के प्रति अटूट आस्था बनाए रखने की दिशा में प्रयत्न करते रहना ताकि विधर्मी यों द्वारा अनेकों प्रलोभन दिए जाने के बाद भी धर्मांतरण ना हो सके इस दिशा में कार्य करते रहना।

12.  बहुधा देखा जा रहा है कि सरकार द्वारा प्रतिबंधित बाल विवाह की अनदेखी हो रही है इस विषय में गंभीरतापूर्वक रोग लगवाना तथा आवश्यकतानुसार शासन का सहयोग प्राप्त करना।

13. आज के इस उन्नत समाज में विधवा नारी तथा वृद्ध महिलाओं के प्रति समाज में उपेक्षा प्रायः देखी जा सकती है। ऐसी परिस्थिति में समाज में उन्हें उचित सम्मान दिलाना तथा आवश्यकतानुसार विधाई संस्थानों का सहयोग लेना।

14.  हिंदू धर्म के मठ मंदिरों,गुरुकुल के सेवकों पर हो रहे अत्याचार, कुठाराघात के प्रति सजग रहना तथा यथासंभव उनकी मदद करना। आवश्यकता होने पर विधाइ संस्थानों से मदद लेना।

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